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माटी, देश, प्रेम बनाम सत्ता, दुकान, बाजार

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बचपन का दौर याद आ गया। गांव में तब बाबा-ओबा का अलग संस्करण था। जो भी था वह भी लिखने लायक विषय है, लेकिन फिर कभी। फिलहाल, 'ओबा' (ओवर ब्रॉन्ड) बाबाओं का अनुलोम-विलोम, कपालभाति, जड़ी-बूटी या फिर साबुन-तेल वाला संस्करण नहीं था। चीजें तो ये तब भी थीं लेकिन किसी महिमामंडित बोध (आस्था, भक्ति या विश्व गुरु टाइप) से ग्रसित नहीं थी। ये सारी चीजें हमारे आसपास की थीं। हमारे माटी की थीं। हमारे दिनचर्या की थीं। घरों के पास खाली जमीनों, बेढ़े, बारियों में नीम, बेल, जामुन, आंवला, नीबू और तरह-तरह के पौधों- तुलसी, भांग, मदार, रेड़, भड़भाड़, कुकुरौंधा, मोथा, कचूर, गुरुचि (गिलोय), हाथीचक्र (एलोवेरा) आदि का भरमार था। तब यही देश था। जीवन था। और इसी से प्रेम था। क्योंकि इन्हीं चीजों में दवा दुआ और पेट का खुराक था। हां, सरकारी अस्पताल भी था जो आज भी लगभग वही है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब दवा की दुकानें और दुकान के डॉक्टर नहीं थे, आज भरमार है। दूर-दराज इक्का-दुक्का हकीम-बैद्य थे तो कम से कम इंसान थे। अफसोस, उनके पास कोई ब्रॉन्ड या राष्ट्रवादी नुस्खा नहीं था। बचपन फोड़े-फुन्सियों से भरा था। गांव में मा...